Skip to main content

बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर..

बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर..

🖋 कुंदन सिंह कनिष्क

टांगो के बीच से जन्म लेने के बाद

वक्षस्थल से अपनी प्यास और भूख मिटाने वाला इंसान,

बड़ा होते ही औरतों से इन्ही दो अंगों की चाहत रखता है!!!!!

और इसी चाहत में बीभत्स तरीकों को इख्तियार करता है.......जैसे
बलात्कार
और फिर हत्या.....?
या एसिड अटैक .......??


ये कैसी चाहत है औरत से...???


जननी वर्ग के साथ इस तरह की धिनौनी  मानसिकता..??
का
वध होना चाहिए ।।।।

ऐसी कुत्सित मानसिकता वालें लोगों का.....सचमुच वध होना चाहिए ।।

बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर..
...... विचार करें दोस्तों .........

          *******युवा सोच******

Comments

Popular posts from this blog

एनपीए कैसे कम होता है?

युवा सोच   जनता की खून पसीने की कमाई का पैसा पूंजीपतियों को लूटा कर भारती शिपयार्ड (जी हाँ, भारती एयरटेल वालों की ही है, ऐसे बड़े नामों वाले केस बहुत हैं, माल्या तो छोटा ही है!) का 10 हज़ार करोड़ का कर्ज NPA हुआ| बैंक कैसे वसूल करते? अब यह कर्ज 3 हज़ार करोड़ में एडेलवीस को बेच दिया गया जिसे शुरू में सिर्फ 450 करोड़ देने हैं, बाकी किश्तों में| कंपनी का नाम बदल दिया गया है और 7 हजार करोड़ सर से उतरे तो दौड़ेगी भी! कम्पनी की क़ीमत बढ़ेगी, दाँव लगाने वाले वित्तीय पूँजीपति तगड़ा मुनाफा कमायेंगे|  और बैंक का 7 हज़ार करोड़ का बट्टे खाते में जाने वाला नुकसान ? वह हम देंगे, बढ़ते बैंक चार्ज, घटते डिपाजिट ब्याज़ से सिर्फ बैंक ग्राहक ही नहीं, बल्कि बैंक में जमा करने लायक कमाई न करने वाले भी क्योंकि सरकार बैंक को और पूँजी देगी| तो और टैक्स दें, बढे रेल भाड़े दें, बढ़ी कीमतें दें, 'राष्ट्रवादी' बनें!  पर 10 हज़ार करोड़ एनपीए तो कम हो गया ना, मितरों! By : Kundan Singh Kanishk.....

सुबह की शुरुआत मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ...

कुंदन सिंह कनिष्क के कलम से...🖋️   मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ जहाँ आदमी आदमी से घृणा नहीं करे जहाँ धरती प्रेम के आशीर्वाद से पगी हो और रास्ते शान्ति की अल्पना से सुसज्जित मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ जहाँ सभी को आज़ादी की मिठास मिले जहाँ अन्तरात्मा को लालच मार नहीं सके जहाँ धन का लोभ हमारे दिनों को नष्ट नहीं कर सके मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ जहाँ काले या गोरे चाहे जिस भी नस्ल के तुम रहो धरती की सम्पदा का तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मिले जहाँ हर आदमी आज़ाद हो जहाँ सिर झुकाये खड़ी हो दुरावस्था जहाँ मोतियों-सा अच्छल हो आनन्द और सबकी ज़रूरतें पूरी हों ऐसा ही सपना देखता हूँ मैं इस धरती का....

Kundan singh kanishk (युवा सोच): धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो!

Kundan singh kanishk (युवा सोच): धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो!