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बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर..

बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर.. 🖋 कुंदन सिंह कनिष्क टांगो के बीच से जन्म लेने के बाद वक्षस्थल से अपनी प्यास और भूख मिटाने वाला इंसान, बड़ा होते ही औरतों से इन्ही दो अंगों की चाहत रखता है!!!!! और इसी चाहत में बीभत्स तरीकों को इख्तियार करता है.......जैसे बलात्कार और फिर हत्या.....? या एसिड अटैक .......?? ये कैसी चाहत है औरत से...??? जननी वर्ग के साथ इस तरह की धिनौनी  मानसिकता..?? का वध होना चाहिए ।।।। ऐसी कुत्सित मानसिकता वालें लोगों का.....सचमुच वध होना चाहिए ।। बलात्कार से बड़ा कोई ज़ुर्म नहीं है धरती पर.. ...... विचार करें दोस्तों .........           *******युवा सोच******

जीएसटी - जनता की जेब से आखिरी कौड़ी भी छीन लेने पर आमादा पूँजीपतियों की नई चाल

जीएसटी - जनता की जेब से आखिरी कौड़ी भी छीन लेने पर आमादा पूँजीपतियों की नई चाल जीएसटी पर बहुत सारे लोग इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि यह बगैर तैयारी के लागू की जा रही है| तो माना जाय पूरी तैयारी से लागू होने पर इसे जनता के हित में मानकर इसका स्वागत किया जाता? नोटबंदी के वक़्त भी मैंने इस क़िस्म की आलोचना पर सवाल उठाया था|इस क़िस्म की आलोचना एक समान हितों वाले वर्ग रहित समाज में ही की जा सकती है| मौज़ूदा वर्ग विभाजित, ग़ैरबराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों पर असर समझे बग़ैर चर्चा बेमतलब है| इस दृष्टिकोण से कुछ अहम् बिंदु: 1. पूँजीवादी जनवाद के दृष्टिकोण से भी अप्रत्यक्ष करों के दायरे को बढ़ाना एक प्रतिगामी कदम है क्योंकि इनकी दर सभी के लिए 'समान' होने से आमदनी के हिस्से के तौर देखें तो जितनी कम आमदनी हो उसका उतना बड़ा हिस्सा कर में देना पड़ता है और जितनी ज्यादा आमदनी उतना कम हिस्सा| जहाँ पूँजीवाद अपने प्रगतिशील दौर में स्थापित हुआ था उन तुलनात्मक विकसित देशों में कुल करों का 2 तिहाई प्रत्यक्ष करों और एक तिहाई अप्रत्यक्ष करों से वसूल किया जाता है| भ...

मध्यप्रदेश में 5 किसानों की हत्या के विरोध में

मध्यप्रदेश में 5 किसानों की हत्या के विरोध में बर्तोल्त ब्रेख्त की एक प्रासंगिक कविता - आठ हजार गरीब लोगों का नगर के बाहर इकट्ठा होना 🖋 कुंदन सिंह कनिष्क आठ हजार से अधिक बेरोजगार खानकर्मी, अपने बीवी-बच्‍चों समेत बुडापेस्‍ट के बाहर साल्‍गोटार्जन रोड पर जामा हो रहे हैं। उन्‍होंने अपने अभियान में पहली दो रातें बिना कुछ खाये-पिये ही गुजार दी है। उनके शरीर पर बेहद नाकाफी जीर्ण-शीर्ण कपड़े हैं। देखने में वे बस हड्डियों के ढांचे ही भर हैं। अगर वे खाना और काम पाने में नाकाम रहे,  तो उन्‍होंने कसम खा रखी है कि वे बुडापेस्‍ट पर धावा बोल देंगे, भले ही इससे खून-खराबा ही क्‍यों न शुरू हो जाये, उनके पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। बुडापेस्‍ट क्षेत्र में सैनिक बल तैनात कर दिये गये हैं, तथा उन्‍हें सख्‍त आदेश दे दिये गये हैं कि अगर लेशमात्र भी शांति भंग तो वे अपने आग्‍नेयास्‍त्र इस्‍तेमाल करें।’ ........................................ हम जा पहुँचे सबसे बड़े शहर में हममें से 1000 भूख से पीड़ि‍त थे 1000 के पास खाने को कुछ नहीं था 1000 को खाना चाहिए था। जनरल ने अपनी खिड़की से ...

हमारी इंडियन आर्मी

युवा सोच आज भीम आर्मी बनी कल पटेल आर्मी बनिया आर्मी ब्राह्मण आर्मी ठाकुर आर्मी तेली आर्मी कायस्थ आर्मी  अरे मूर्खो फिर हमारी इंडियन आर्मी क्या करेगी?

Kundan singh kanishk (युवा सोच): धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो!

Kundan singh kanishk (युवा सोच): धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो!

धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो!

युवा सोच 🖋 Kundan Singh Kanishk धार्मिक बँटवारे की साज़िशों को नाकाम करो! पूँजीवादी लूट के ख़िलाफ़ एकता क़ायम करो! 👉 *धर्म और फासीवाद के बारे में कुछ उद्धरण* 🔶जब तक लोग अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने की ज़हमत नहीं उठायेंगे, तब तक तानाशाहों का राज चलता रहेगा; क्योंकि तानाशाह सक्रिय और जोशीले होते हैं, और वे नींद में डूबे हुए लोगों को ज़ंजीरों में जकड़ने के लिए, ईश्वर, धर्म या किसी भी दूसरी चीज़ का सहारा लेने में नहीं हिचकेंगे। 🖊 फ्रांसीसी क्रान्ति की वैचारिक नींव तैयार करने वाले महान दार्शनिकों में से एक – वोल्तेयर 🔶एक तरफ जहाँ जन आन्दोलन और राष्ट्रीय आन्दोलन हुए, वहीं, उनके साथ-साथ जातिगत और साम्प्रदायिक आन्दोलनों को भी जान-बूझकर शुरू किया गया क्योंकि ये आन्दोलन न तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ थे, न किसी वर्ग के, बल्कि ये दूसरी जातियों के ख़िलाफ़ थे। 🖊 साम्प्रदायिक जुनून का मुकाबला करते हुए शहीद होने वाले महान राष्ट्रवादी पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी 🔶प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ वर्ग ने अपने आप को हर जगह धार्मिक झगड़ों को उभाड़ने के दुष्कृत्यों में संलग्न किया है, और वह र...

अर्थव्यवस्था चकाचक है तो लाखों इंजीनियर नौकरी से निकाले क्यों जा रहे हैं?

युवा सोच अर्थव्यवस्था चकाचक है तो लाखों इंजीनियर नौकरी से निकाले क्यों जा रहे हैं? 🖋Kundan Singh kanishk नरेन्द्र मोदी विकास के बड़े-बड़े दावे करते हुए सत्ता में आये थे। देश को ऐसी विकास यात्रा पर ले चलने के सपने दिखाये गये थे जिसमें करोड़ों रोज़गार पैदा होंगे। मगर पिछले 3 साल में गौरक्षक दलों, लम्पट वाहिनियों और स्वयंभू एंटी-रोमियो दस्तों ‍आदि के अलावा नये रोज़गार कहीं पैदा होते नहीं दिख रहे हैं। उल्टे , आईटी जैसे जिन क्षेत्रों के लोग अपने को बहुत सुरक्षित और देश के बाकी अवाम से चार हाथ ऊपर समझते थे, उनके ऊपर भी गाज गिरनी शुरू हो गयी है। पिछले कुछ महीनों में देश की सबसे बड़ी 7 आईटी कम्पनियों से हज़ारों इंजीनियरों और मैनेजरों को निकाला जा चुका है। प्रसिद्ध मैनेजमेंट कन्सल्टेंट कम्पनी मैकिन्सी ‍की रिपोर्ट के अनुसार अगले 3 सालों में हर साल देश के 2 लाख साफ्टवेयर इंजीनियरों को नौकरी से निकाला जायेगा। यानी 3 साल में 6 लाख। ऐसा भी नहीं है कि केवल आईटी कम्पनियों से ही लोग निकाले जा रहे हैं। सबसे बड़ी इंजीनियरिंग कम्पनियों में से एक लार्सेन एंड टुब्रो (एल एंड टी) ने भी पिछले महीन...